प्रशासनिक न्यायाधिकरण
प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम के 1985 में अधिनियमन ने व्यथित सरकारी कर्मचारियों को न्याय देने के क्षेत्र में एक नया अध्याय प्रारम्भ किया। प्रशासनिक न्यायाधिकरण का उद्गव संविधान के अनुच्छेद 323-ए से हुआ है,जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार को, केंद्र और राज्यों के कार्य संचालन के संबंध में लोक सेवा और पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवा शर्तों के संबंध में विवादों और शिकायतों के निपटारे हेतु संसद द्वारा पारित अधिनियम के अंतर्गत प्रशासनिक न्यायाधिकरण स्थापित करने की शक्ति प्राप्त है। प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम 1985 में निहित प्रावधानों के अनुसरण में, स्थापित प्रशासनिक न्यायाधिकरणों को इसके अंतर्गत आने वाले कार्मिकों की सेवा संबंधी मामलों पर मूल क्षेत्राधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय के 18 मार्च 1977 के निर्णय के परिणाम स्वरूप, किसी प्रशासनिक न्यायाधिकरण के आदेश के खिलाफ संबंधित उच्च न्यायालय की खण्डपीठ को अपील की जाएगी।
प्रशासनिक न्यायाधिकरण का क्षेत्राधिकार इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले वादकारी के केवल सेवा संबंधी मामलों पर है। इस अधिनियम की प्रक्रियात्मक सरलता का सहज अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इसके समक्ष शिकायतकर्ता स्वयं अपनी पैरवी कर सकता है। शासन अपने मामले विभागीय अधिकारियों अथवा वकील के माध्यम से प्रस्तुत कर सकता है। इस प्रकार न्यायाधिकरण का उद्देश्य वादकर्ताओं को त्वरित और सस्ता न्याय प्रदान करना है।
इस अधिनियम में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) और राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण स्थापित करने का प्रावधान है। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण की स्थापना नवम्बर 1985 में हुई थी। वर्तमान में इसकी 17 नियमित न्यायपीठ हैं जिनमें से 15 उच्च न्यायालयों के मुख्यालयों में कार्यरत हैं और शेष दो जयपुर और लखनऊ में। ये न्यायपीठ उच्च न्यायालय की अन्य पीठिकाओं पर भी चल सर्किट बैठकें करते हैं। संक्षेप में इस न्यायाधिकरण में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य होते हैं। सदस्य न्यायिक और प्रशासनिक धाराओं से लिए जाते हैं ताकि न्यायाधिकरण को विधिक और प्रशासनिक दोनों हो क्षेत्रों की विशेषज्ञता प्राप्त हो सके।
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