Saturday, 3 December 2016

स्‍थानीय सरकार

स्‍थानीय सरकार

नगरपालिकाएं

नगर निकायों का भारत में लम्‍बा इतिहास है। ऐसे प्रथम नगर निगम की स्‍थापना 1688 में भूतपूर्व मद्रास प्रेसीडेंसी नगर में की गई थी। और तब इसी प्रकार के निगमों द्वारा तब बाम्‍बे और कलकता में 1726 में अपनाया गया। भारत के संविधान में संसद और राज्‍य विधायिकों में प्रजातंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विस्‍तृत व्‍यापक प्रावधान किया गया है। तथापि, संविधान द्वारा शहरी क्षेत्र में स्‍वशासन की स्‍पष्‍ट सांवधैनिक बाध्‍यता नहीं की गई है। जबकि राज्‍य की नीतियों के नीति निर्देशक तत्‍व का आशय ग्राम पंचायतों के संदर्भ में है, राज्‍य सूची की 5 प्रविष्टि में उस्‍पष्‍टता को छोड़कर नगर‍पालिकाओं के लिए विशिष्‍ट संदर्भ नहीं है जो स्‍थानीय स्‍वशासन के विषय को राज्‍यों की जिम्‍मेदारी निर्दिष्‍ट करता है।

शहरी स्‍थानीय निकायों के लिए समान ढांचा प्रदान करने के लिए और स्‍वशासन के प्रभावशील प्रजातांत्रिक यूनिटों के रूप में निकायों के कार्यों को सुदृढ़ बनाने में सहायता देने के लिए संसद में 1992 में नगरपालिकाओं के संबंध में संविधान (74वां संशोधन) अधिनियम, 1992 अधिनियमित किया है। अधिनियम पर राष्‍ट्रपति की सहमति 20 अप्रैल 1993 को प्राप्‍त हुई। भारत सरकार ने 1 जून, 1993 जिस तारीख से उक्‍त अधिनियम लागू हुआ, को अधिसूचित किया। नगरपालिका संबंधी नया भाग IX - क को अन्‍य चीजों के अतिरिक्‍त तीन प्रकार की नगर पालिकाओं को व्‍यवस्‍था करने के लिए संविधान में शामिल किया गया है, अर्थात् ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्र में मार्गस्‍थ के लिए नगर पंचायतें, छोटे आकार के शहरी क्षेत्रों के लिए नगरपालिका परिषद और बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए नगरपालिकाएं, नगरपलिकाओं की नियत अवधि, राज्‍य निर्वाचन आयोग की नियुक्ति, राज्‍य वित्‍त आयोग की नियुक्ति और मेट्रोपोलिटन एवं जिला योजना समितियों का गठन/राज्‍य/संघ राज्‍य क्षेत्रों ने अपना निर्वाचन आयोग गठित किया है। नगर निकायों का चुनाव झारखंड और पांडिचेरी को छोड़कर सभी राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों में पूरा किया जा चुका है।

पंचायतें

संविधान का अनुच्‍छेद 40, जो राज्‍य के नीति निदेशक तत्‍वों में से एक को प्रतिष्‍ठापित करता है यह निर्धारित करता है कि ग्राम पंचायत की व्‍यवस्‍था करने का और स्‍वशासन के यूनिटों के रूप में कार्य करने के लिए समर्थ बनाने हेतु यथा आवश्‍यक शक्ति एवं प्राधिकार प्रदान करने के लिए राज्‍य कदम उठाएंगे।

उपर्युक्‍त के आलोक में अन्‍य चीजों के अतिरिक्‍त गांवों या गांवों के समूह में ग्राम सभा की व्‍यवस्‍था करने के लिए ग्राम और अन्‍य स्‍तर या स्‍तरों पर पंचायतों का गठन, ग्राम और मध्‍यवर्ती स्‍तर पर यदि कोई हो के पंचायतों की सदस्‍यता के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्‍या के अनुपात में सीटों का आरक्षण और पंचायतों में प्रत्‍येक स्‍तर पर अध्‍यक्ष के पद के लिए आरक्षण; कम से कम एक तिहाई सीटों का आरक्षण महिलाओं के लिए, पंचायतों के लिए पांच वर्णों का कार्यकाल निर्धारित करना और किसी पंचायत की बरखास्‍तगी होने पर छह माह की अवधि के अंदर चुनाव कराने की व्‍यवस्‍था करने के लिए पंचायतों के संबंध में संविधान में नया भाग IX शामिल किया गया।

निर्वाचन आयोग

भारत में संसद और राज्‍य विधान मंडलों के निर्वाचन और राष्‍ट्रपति तथा उप राष्‍ट्रपति कार्यालय के निर्वाचन आयोजित करने तथा निर्वाचन सूचियां तैयार करने के पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का कार्य निर्वाचन आयोग के सौंपा गया है। यह एक स्‍वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है। वर्ष 1950 में अपने आरंभ से अक्‍तूबर 1989 त‍क आयोग ने मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त सहित एक एकल सदस्‍य के रूप में कार्य किया। दिनांक 16 अक्‍तूबर 1989 को राष्‍ट्रपति ने नवम्‍बर-दिसम्‍बर 1989 में होने वाले लोक सभा चुनाव के पूर्व दो अन्‍य निर्वाचन आयुक्‍तों की नियुक्ति की। यद्यपि, कथित दो आयुक्‍तों को 1 जनवरी 1990 से कार्य भार संभालने से रोक दिया गया, जब निर्वाचन आयुक्‍त के ये दो पद समाप्‍त कर दिए गए। पुन:, 1 अक्‍तूबर 1993 को राष्‍ट्रपति महोदय ने दो अन्‍य निर्वाचन आयुक्‍तों की नियुक्ति की। इसके साथ, मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त और अन्‍य निर्वाचन आयुक्‍तों (सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1991 को यह प्रदान करने के लिए संशोधित किया गया कि मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त और अन्‍य दो निर्वाचन में आयुक्‍तों को एक समान अधिकार प्राप्‍त हों और एक समान वेतन, भत्ते और अन्‍य पर्क्‍स प्राप्‍त हों, जो भारत के उच्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायधीश को प्राप्‍त होते हैं। इस अधिनियम में पुन: यह बताया गया है कि मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त और/या दो अन्‍य निर्वाचन आयुक्‍तों के बीच मतभेद होने पर इस मामले का निर्णय बहुमत से किया जाएगा। इस अधिनियम की वैधता की जानकारी (1993 में निर्वाचन आयोग के तौर पर नया नाम) (निर्वाचन आयुक्‍तों की सेवा शर्तें और व्‍यवसाय कार्य) अधिनियम, 1991 को उच्‍चतम न्‍यायालय में चुनौती दी गई। यद्यपि, पांच न्‍यायधीशों की संवैधानिक पीठ ने याचिका रद्द की और 14 जुलाई 1995 को एक सर्वसम्‍मत निर्णय द्वारा उपरोक्‍त कानून के प्रावधानों पर रोक लगा दी।

निर्वाचन आयोग की स्‍वतंत्रता और कार्यपालिका के हस्‍तक्षेप को सुरक्षा संविधान की धारा 324 (5) के तहत एक विशिष्‍ट प्रावधान द्वारा सुनिश्चित की गई है कि मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त को उनके कार्यालय से इस प्रकार और उच्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायधीश के समान आधार के अलावा हटाया नहीं जाएगा और उनकी सेवा की शर्तें उनकी नियुक्ति के बाद उन्‍हें हानि पहुंचाने के लिए बदली नहीं जाएंगी। अन्‍य निर्वाचन आयुक्‍तों को मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त की सिफारिश के बिना हटाया नहीं जा सकता है। मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त और अन्‍य निर्वाचन आयुक्‍तों के कार्यालय का कार्यकाल कार्य भार संभालने की तिथि से 6 वर्ष अथवा उनके 65 वर्ष की आयु पर पहुंचने तक होता है, इनमें से जो भी पहले हो।

संशोधन

22 मार्च 2003 को संसद में निर्वाचन कानून (संशोधन) अधिनियम, 2003 को लागू किया और निर्वाचन आयोजन (संशोधन) नियम, 2003, जो 22 सितंबर 2003 से प्रभावी हुआ। अधिनियम और नियमों में इन संशोधनों द्वारा सशस्‍त्र बलों के सेवा मतदाताओं और उन बलों के सदस्‍यों को प्रॉक्‍सी के ज़रिए मतदान का अधिकार देता है, जिन पर सेना अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं। ये सेवा मतदाता, जो प्रॉक्‍सी के माध्‍यम से मत देने का विकल्‍प अपनाते हैं, उन्‍हें एक निर्धारित फॉर्मेट में एक प्रॉक्‍सी की नियुक्ति करनी होती है और निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचन अधिकारी को सूचित करे।
निर्वाचन और अन्‍य संबंधित कानून (संशोधन) अधिनियम, 2003 (2003 का 46) को 11 सितंबर 2003 को लागू किया गया था। इस संशोधन द्वारा प्रधान अधिनियम में नई धारा 29बी और 29सी शामिल की गईं, जिनमें बताया गया है कि आयकर अधिनियम, 1961 के तहत कर राहत के किसी दावे के लिए 20,000 रु. से अधिक किसी अंशदान की जानकारी निर्वाचन आयोग को दी जाएगी, जो किसी सरकारी कम्‍पनी के अलावा व्‍यक्ति या कम्‍पनी द्वारा राजनैतिक दलों को दिया जाता है। इस अधिनियम में भाग ए (धारा 78ए और 78बी) भी शामिल किया गया है जो निर्वाचन सूचियों की प्रतियों तथा मान्‍यताप्राप्‍त राजनैतिक दलों के प्रत्‍याशियों की सूची प्रदान करने के विषय में है। इस अधिनियम में प्रत्‍याशियों द्वारा किए जाने वाले चुनावी व्‍यय के रखरखाव की जानकारी दी गई है, जिसके द्वारा हवाई मार्ग से केवल उस राजनैतिक दल के कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए किसी अन्‍य मार्ग से परिवहन पर एक राजनैतिक दल के ''नेताओं'' की निर्दिष्‍ट संख्‍या द्वारा किए गए व्‍यय को निर्वाचन के संबंध में प्रत्‍याशियों द्वारा किए गए व्‍यय के खाते में लिया जाएगा।

संसद ने 1 जनवरी 2004 को असीमन (संशोधन) अधिनियम, 2003 को लागू किया, जिसके द्वारा प्रधान अधिनियम की धारा 4 यह बताने के‍ लिए संशोधित की गई कि असीमन का कार्य 2001 जनगणना आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा।

संसद ने 28 अगस्‍त 2003 का लोक प्रतिनिधित्‍व (संशोधन) अधिनियम, 2003 को लागू किया, जिसके माध्‍यम से खुली बैलट प्रणाली राज्‍यों की परिषद के निर्वाचनों में शामिल की गई। इस प्रणाली में एक निर्वाचक, जो एक राजनैतिक पार्टी का है, उसे उस राजनैतिक दल के अधिकृत प्रतिनिधि का अपना मतदान करने के बाद बैलट पेपर दिखाना होता है। एक राज्‍य विशेष से राज्‍यों की परिषद में निर्वाचन में भाग वाले एक प्रत्‍याशी की आवश्‍यकता, उस राज्‍य विशेष में एक निर्वाचक की होनी चाहिए, को भी निपटाया गया था।

निर्वाचन में सुधार

सी. डब्‍ल्‍यू. पी. 4912, (कुशरा भारत बनाम भारत संघ और अन्‍य) में दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय ने निर्देश दिया कि सरकारी आवास, बिजली, पानी, टेलीफोन और परिवहन (हवाई जहाज़ और हेलीकॉप्‍टर सहित) विभाग में प्रत्‍याशी द्वारा देय धनराशि से संबंधित सूचना और प्रत्‍याशी द्वारा प्रस्‍तुत अन्‍य कोई देश राशि की जानकारी निर्वाचकों की सूचना हेतु स्‍थानीय वितरण वाले कम से कम दो समाचार पत्रों में आयोग के तहत निर्वाचन प्राधिकारियों द्वारा प्रकाशित की जाएगी। तदनुसार, प्रत्‍याशी की पृष्‍ठभूमि के विषय में आयोग द्वारा निर्वाचकों की सूचना के अधिकार से संबंधित 27 मार्च 2003 के आदेश में निर्धारित शपथपत्र फॉर्मेट में मद 3 (ए) (iii) को संशोधित किया और प्रत्‍याशी द्वारा प्रस्‍तुत इस सूचना को जिला निर्वाचन अधिकारियों को अनिवार्य निर्देश भी जारी किए गए, जैसा दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय द्वारा निर्देश दिया गया है।

संघ राज्‍य क्षेत्र

संघ राज्‍य क्षेत्र

संघ राज्‍य क्षेत्रों का प्रशासन उस दायरे तक कार्य करते हुए जो वह उचित समझे, उसके द्वारा नियुक्‍त प्रशासक द्वारा किया जाता है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दिल्‍ली और पांडिचेरी के प्रशासकों को लेफ्टीनेंट गवर्नर का पद का पद दिया गया है। पंजाब का राज्‍यपाल समवर्ती रूप से चंडीगढ़ का प्रशासक है। दादरा और नगर हवेली के प्रशासक समवर्ती रूप से दमन और दीव का प्रशासक है। लक्षद्वीप का अलग प्रशासक है।

दिल्‍ली राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र और पांडिचेरी संघ राज्‍य क्षेत्र में एक विधान सभा और मंत्रियों की परिषद है। पांडिचेरी संघ राज्‍य क्षेत्र की विधान सभा संघ राज्‍य क्षेत्र के प्रशासन में लागू होने वाले इन मामलों के विषय में संविधान की सातवीं अनुसूची में सूची 2 या सूची 3 में बताए गए मामलों के संदर्भ में कानून बना सकती है। दिल्‍ली राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र की विधान सभा को भी सूची 2 की प्रविष्टि 1, 2 और 18 के अतिरिक्‍त अधिकार हैं जो विधान सभा की विधायी दक्षता के अंतर्गत नहीं है। विधेयकों की कुछ विशिष्‍ट श्रेणियों में, यद्यपि विधान सभा में प्रस्‍तुत करने के पहले केन्‍द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन की आवश्‍यकता होती है। पांडिचेरी संघ राज्‍य क्षेत्र और राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली की विधान सभाओं द्वारा पारित कुछ विधेयकों को राष्‍ट्रपति महोदय के विचार और अनुमोदन के लिए आरक्षित करने की आवश्‍यकता होती है।

राजनीतिक व्‍यवस्‍था

राजनीतिक व्‍यवस्‍था

राज्‍यों में सरकार की प्रणाली केन्‍द्र की प्रणाली के निकट सदृश है।

कार्यपालिका

राज्‍यपाल

राज्‍य की कार्यपालिका में राज्‍यपाल और मुख्‍यमंत्री के नेतृत्‍व में मंत्री परिषद् होती है। राज्‍य के राज्‍यपाल की नियुक्ति पांच वर्षों के कार्यकाल के लिए राष्‍ट्रपति द्वारा की जाती है, और जब तक राष्‍ट्रपति चाहता है वह अपने पद पर रहता है। केवल भारत के नाग‍रिक, जिनकी आयु 35 वर्ष हो, इस पद पर नियुक्ति के पात्र होते हैं। राज्‍य की कार्य पालिका की शक्ति राज्‍यपाल के पास होती है।

मंत्री परिषद

मुख्‍यमंत्री की नियुक्ति राज्‍यपाल द्वारा की जाती है और वह मुख्‍यमंत्री की मंत्रणा से अन्‍य मंत्रियों की भी नियुक्ति करता है। मंत्री परिषद संयुक्‍त रूप से राज्‍य के विधान सभा के प्रति उत्‍तरदायी होती है।

विधायिका

प्रत्‍येक राज्‍य के लिए एक विधायिका होती है, जिसमें राज्‍यपाल और एक सदन या दो सदन जैसा भी मामला हो, होते हैं। बिहार, जम्‍मू और कश्‍मीर, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र और उत्‍तर प्रदेश में दो सदन हैं जिन्‍हें विधान परिषद और विधान सभा के रूप में जाना जता है। संसद कानून बनाकर मौजूदा विधान परिषद को भंग करने या जहां यह नहीं है वहां इसका सृजन करने की व्‍यवस्‍था कर सकता है यदि प्रस्‍ताव संबंधित विधान सभा के संकल्‍प द्वारा समर्थित हो।

विधान परिषद

राज्‍य के विधान परिषद (विधान परिषद) में राज्‍य के विधान सभा में सदस्‍यों की कुल संख्‍या की एक तिहाई और किसी भी कारणों से 40 सदस्‍य से कम सदस्‍य नहीं होते हैं (जम्‍मू और कश्‍मीर के विधान परिषद में जम्‍मू और कश्‍मीर के संविधान के अनुच्‍छेद 50 द्वारा 36 सदस्‍यों की व्‍यवस्‍था की गई है)। परिषद के लगभग एक तिहाई सदस्‍य विधान सभा के सदस्‍यों द्वारा ऐसे व्‍यक्तियों में से चुने जाते हैं जो इसके सदस्‍य नहीं है, िएक तिहाई निर्वाचिका द्वारा, जिसमें नगरपालिकाओं के सदस्‍य, जिला बोर्डों और राज्‍य में अन्‍य प्राधिकरणों के सदस्‍यों द्वारा चुने जाते है, एक बारह का चुनाव निर्वाचिका द्वारा ऐसे व्‍यक्तियों में से चुने जाते हैं जिन्‍होंने कम से कम तीन वर्षों तक राज्‍य के भीतर शैक्षिक संस्‍थाओं में अध्‍यपन में लगा रहा हो जो माध्‍यमिक विद्यालयों की कक्षों के नीचे न हो और अन्‍य एक बारह का चुनाव सी पंजीकृत स्‍नातकों द्वारा किया जाता है जो तीन वर्ष से अधिक समय पहले पढ़ाई समाप्‍त कर लिए है। शेष सदस्‍य राज्‍यपाल द्वारा साहित्‍य, विज्ञान, कला, सहयोग आन्‍दोलन और सामाजिक सेवा में उत्‍कृष्‍ट कार्य करने वाले व्‍यक्तियों में से नियुक्‍त किए जाते है। विधान परिषदों को भंग नहीं किया जा सकता परन्‍तु उनके एक तिहाई सदस्‍य प्रत्‍येक दूसरे वर्ष में सेवा निवृत्‍त होते हैं।

विधान सभा

राज्‍य का विधान सभा (विधान सभा) में 500 से अनधिक और कम से कम 60 सदस्‍य राज्‍य में क्षेत्रीय चुनाव क्षेत्रों से प्रत्‍यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाते हैं ( संविधान के अनुच्‍छेद 371 एक द्वारा सिक्किम के विधान सभा में 32 सदस्‍यों की व्‍यवस्‍था की गई है। क्षेत्रीय चुनाव का सीमांकन ऐसा‍ किया जाना है कि प्रत्‍येक चुनाव क्षेत्र की जनसंख्‍या और इसको आबंटित सीटों की संख्‍या के बीच अनुपात जहां तक व्‍यावहारिक हो पूरे राज्‍य में एक समान हो। संविधान सभा का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है जब तक कि इसे पहले भंग न किया जाए।

अधिकार और कार्य

राज्‍य विधान मंडल को संविधान की सातवीं अनुसूची 2 में बताए गए विषयों पर और उसके साथ अनुसूवी 3 में बताए गए विषय में सूचीबद्ध अधिकारों पर विशिष्‍ट अधिकार हैं जिनमें राज्‍य सरकार द्वारा किए जाने वाले सभी व्‍ययों, कर निर्धारण और उधार लेने के प्राधिकार शामिल हैं। राज्‍य विधान सभा को अकेले ही यह अधिकार है कि मौद्रिक विधेयक का उदभव करे। विधान सभा से मौद्रिक विधेयक प्राप्‍त होने के 14 दिनों के अंदर अनिवार्य पाए जाने पर विधान परिषद केवल इसमें किए जाने वाले परिवर्तनों की सिफारिश कर सकती है। विधान सभा इन सिफारिशों को स्‍वीकार या अस्‍वीकार कर सकती है।

विधेयकों का आरक्षण

एक राज्‍य के राज्‍यपाल को अधिकार है कि वह राष्‍ट्रपति के पास विचाराधीन किसी विधेयक को आरक्षित करे। सम्‍पत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण, उच्‍च न्‍यायालय की स्थिति और अधिकारों को प्रभावित करने वाले उपाय और अंतर राज्‍यीय नदी या नदी घाटी विकास परियोजना में बिजली वितरण या पानी के भंडारण, वितरण और बिक्री पर कर आरोपण जैसे विषयों पर विधेयकों को अनिवार्यत: इस प्रकार आरक्षित किया जाए। राष्‍ट्रपति के पूर्व अनुमोदन के बिना, अंतर राज्‍यीय व्‍यापार पर प्रतिबंध लगाने वाले किसी विधयेक को राज्‍य विधान मंडल में प्रस्‍तुत नहीं किया जा सकता है।

कार्यपालिका पर नियंत्रण

राज्‍य विधायिका वित्तीय नियंत्रण के सामान्‍य अधिकार के उपयोग के अलावा सभी सामान्‍य संसदीय युक्तियों का उपयोग करता है, कार्यपालिका के दैनिक कार्यों पर नजर रखने के लिए जैसे प्रश्‍न, चर्चा, वाद-विवाद, स्‍थगित करना और अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाना एवं प्रस्‍ताव पारित करने का उपयोग करता है। उनकी आकलन और सार्वजनिक लेखा पर समितियां भी हैं, जो सुनिश्वित करती हैं कि विधायिका द्वारा स्‍वीकृत अनुदानों का उपयोग उचित रूप से किया जा रहा है।

स्रोत: भारत 2011

प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण

प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण

प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण अधिनियम के 1985 में अधिनियमन ने व्‍यथित सरकारी कर्मचारियों को न्‍याय देने के क्षेत्र में एक नया अध्‍याय प्रारम्‍भ किया। प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण का उद्गव संविधान के अनुच्‍छेद 323-ए से हुआ है,जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार को, केंद्र और राज्‍यों के कार्य संचालन के संबंध में लोक सेवा और पदों पर नियुक्‍त व्‍यक्तियों की भर्ती और सेवा शर्तों के संबंध में विवादों और शिकायतों के निपटारे हेतु संसद द्वारा पारित अधिनियम के अंतर्गत प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण स्‍थापित करने की शक्ति प्राप्‍त है। प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण अधिनियम 1985 में निहित प्रावधानों के अनुसरण में, स्‍थापित प्रशासनिक न्‍यायाधिकरणों को इसके अंतर्गत आने वाले कार्मिकों की सेवा संबंधी मामलों पर मूल क्षेत्राधिकार प्राप्‍त है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय के 18 मार्च 1977 के निर्णय के परिणाम स्‍वरूप, किसी प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण के आदेश के खिलाफ संबंधित उच्‍च न्‍यायालय की खण्‍डपीठ को अपील की जाएगी।

प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण का क्षेत्राधिकार इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले वादकारी के केवल सेवा संबंधी मामलों पर है। इस अधिनियम की प्रक्रियात्‍मक सरलता का सहज अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इसके समक्ष शिकायतकर्ता स्‍वयं अपनी पैरवी कर सकता है। शासन अपने मामले विभागीय अधिकारियों अथवा वकील के माध्‍यम से प्रस्‍तुत कर सकता है। इस प्रकार न्‍यायाधिकरण का उद्देश्‍य वादकर्ताओं को त्‍वरित और सस्‍ता न्‍याय प्रदान करना है।

इस अधिनियम में केंद्रीय प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण (कैट) और राज्‍य प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण स्‍थापित करने का प्रावधान है। केंद्रीय प्रशासनिक न्‍यायाधिकरण की स्‍थापना नवम्‍बर 1985 में हुई थी। व‍र्तमान में इसकी 17 नियमित न्‍यायपीठ हैं जिनमें से 15 उच्‍च न्‍यायालयों के मुख्‍यालयों में कार्यरत हैं और शेष दो जयपुर और लखनऊ में। ये न्‍यायपीठ उच्‍च न्‍यायालय की अन्‍य पीठिकाओं पर भी चल सर्किट बैठकें करते हैं। संक्षेप में इस न्‍यायाधिकरण में एक अध्‍यक्ष, उपाध्‍यक्ष और सदस्‍य होते हैं। सदस्‍य न्‍यायिक और प्रशासनिक धाराओं से लिए जाते हैं ताकि न्‍यायाधिकरण को विधिक और प्रशासनिक दोनों हो क्षेत्रों की विशेषज्ञता प्राप्‍त हो सके।

प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायतें

प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायतें

कार्मिक लोक शिकायतें और पेंशन मंत्रालय में प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग, प्रशा‍सनिक सुधारों तथा विशेष रूप से केंद्रीय सरकार के संगठनों एवं सामान्‍य तौर पर राज्‍य तथा संघ राज्‍य क्षेत्र के प्रशासन से संबंधित लोक शिकायतों के समाधान के लिए सरकार की नोडल एजेंसी है। यह विभाग केंद्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों के लिए प्रबंधन परामर्शी सेवाओं की व्‍यवस्‍था करता है। विभाग विभिन्‍न प्रकाशनों और प्रलेखनों के जरिए प्रशासनिक सुधारों और लोक शिकायतों के समाधान संबंधी सरकार के महत्‍वपूर्ण कार्यकलापों के बारे में सूचना प्रदान करता है। यह विभाग लोक सेवा सुधारों को प्रोत्‍साहन देने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय आदान प्रदान और सहयोग के क्षेत्र में भी कार्यकलाप करता है।

इस विभाग का अभियान केंद्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों, राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों के प्रशासनों, संगठनों और लोक समाज प्रतिनिधों के परामर्श से प्रक्रम पुन: अभियांत्रिकी, व्‍यवस्थित परिवर्तनों, शिकायत निपटान की सक्षम विधियां और व्‍यवस्‍था तथा आधुनिकीकरण को प्रोत्‍साहन देकर, नागरिक अधिकार पत्र, पुरस्‍कार योजनाओं, ई-शासन तथा सरकार की सर्वोत्‍तम प्रथाओं के माध्‍यम से सरकार की कार्यशैली में सुधार लाने के लिए एक सुविधा प्रदानकर्ता के रूप में कार्य करना है।

प्रशास‍निक कानूनों की समीक्षा पर मौजूदा कानूनों, विनियमों और प्रक्रिया विधियों के संशोधन हेतु प्रस्‍ताव को चिन्हित करने के विचार से 8 मई 1998 को प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग द्वारा एक आयोग का गठन किया गया, जिनका अंतर-क्षेत्रीय प्रभाव है और जो सभी अप्रभावी कानूनों के निरसन के लिए भी कार्य करता है। विभिन्‍न मंत्रालयों/ विभागों ने 822 अधिनियमों को यथावत् रखने का निर्णय लिया (जिनमें 700 विनियोजन अधिनियम और 27 पुन: व्‍यवस्‍था अधिनियम शामिल हैं)। शेष बचे अधिनियम प्रसंस्करण के विभिन्‍न चरणों में हैं।

विभाग ने वर्ष 2005 में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन श्री वीरप्‍पा मोइली की अध्यक्षता में लोक प्रशासन प्रणाली को नया रूप देने के लिए एक विस्‍तृत रूपरेखा तैयार करने के लिए किया है। यह आयोग देश में सरकार के सभी स्‍तरों पर एक सक्रिय उत्‍तरदायी, जवाबदेह, स्‍थायी और सक्षम प्रशासन लाने के उपाय सुझाएगा। आयोग का कार्यकाल 30 अप्रैल 2009 को समाप्त हो चुका है।
और अपनी रिपार्ट में आयोग ने निम्न 15 सुझाव पेश किए हैं:-
  1. सूचना का अधिकार - अच्‍छे शासन की मुख्‍य कुंजी (09.06.2006)
  2. मानव पूंजी को खोलना - पात्रता और शासन - एक प्रकरण अध्‍ययन (31.07.2006)
  3. संकट काल में प्रबंधन - निराशा से आशा की ओर (31.10.2006)
  4. शासन में नैतिकता (12.02.2007)
  5. जन आदेश- प्रत्‍येक के लिए न्‍याय ..... सभी के लिए शांति (25.06.2007)
  6. स्थानीय प्रशासन (27.11.2007)
  7. संघर्ष के समाधान के लिए क्षमता बढ़ाना - मतभेद से सम्मिलन की ओर (17.3.2008)
  8. आतंकवाद का मुकाबला (17.9.2008)
  9. सामाजिक पूंजी - एक साझी नियति (8.10.2008)
  10. वैयक्तिक प्रशासन का पुनर्गठन - नई उंचाइयों की प्राप्ति (27.11.2008)
  11. ई-प्रशासन को बढ़ावा - भविष्य की ओर सोचा समझा कदम (20.01.2009)
  12. जन केंद्रित प्रशासन - प्रशासन का हृदय (30.3.2009)
  13. भारत सरकार का संगठनात्मक ढ़ांचा (19.5.2009)
  14. वित्तीय प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत बनाना (26.5.2009)
  15. राज्य और जिला प्रशासन (29.5.2009)
आयोग की सिफारिशों के कार्यान्‍वयन की समीक्षा और निर्णयों के पालन में संबंधित मंत्रालयों / विभागों को मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए मंत्रियों के एक समूह का गठन किया गया है।

विभाग ने 2005 में केंद्र और राज्‍य सरकारों के अधिकारियों द्वारा किए गए असाधारण और नवाचारी कार्यों को मान्‍यता देने के लिए ''लोक प्रशासन में उत्‍कृष्‍टता के लिए प्रधान मंत्री पुरस्‍कार'' की स्‍थापना भी की।
  1. एक पदक
  2. प्रशस्ति पत्र और
  3. 1,00,000 रु. का नकद पुरस्‍कार
अधिकारियों के समूह के मामले में समूह के लिए 5 लाख रु. का कुल पुरस्‍कार, जो प्रत्‍येक व्‍यक्ति को एक लाख रु. तक दिया जाता है। एक संगठन के लिए यह 5 लाख रु. तक सीमित होगी। केंद्र और राज्‍य सरकारों के सभी अधिकारियों को अगल अलग या समूह में या एक संगठन के रूप में पुरस्‍कार हेतु विचार में लिए जाने की पात्रता होगी। यह पुरस्‍कार प्रति वर्ष 21 मार्च को लोक सेवा दिवस के अवसर पर प्रदान किया जाता है।
ई-प्रशासन के तहत विभाग ई-कार्यालयों के गठन की प्रक्रिया से गुजर रहा है। राष्ट्रीय ई-प्रशासन योजना के अंतर्गत् यह एक प्रमुख परियोजना है। ई-कार्यालय के प्रयासों का लक्ष्य केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों की कार्यशैली में तेजी ला कर इनकी कार्यक्षमता में अपेक्षित वृद्धि करना है। यह प्रयास जीपीआर के क्रियान्वयन में बहुत अहम होगा विशेषकर प्रशासन से प्रशासन के मध्य की प्रक्रिया में, जिसका असर आम जनता को मिलने वाली सेवा पर पड़ता है। यह विभाग परियोजना को लागू करने में नोडल एजेंसी की भूमिका निभा रहा है।

विभाग ई-प्रशासन पर एक वार्षिक सम्मेलन का आयोजन किसी प्रदेश की राजधानी में करती है। जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, क्षेत्र के जानकार और विषय विशेषज्ञ भाग लेते हैं। इन सम्मेलनों में ई-प्रशासन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी वितरित किए जाते हैं। यह पुरस्कार ई-प्रशासन के तहत चलाए जा रही सरकारी प्रयासों के तहत बेहतर परिणाम, कुशलता, गुणवत्ता, सेवाओं की पूर्ति या इन सबके सम्मिलित परिणामों के लिए प्रदान किए जाते हैं।

विभाग ने सरकारी विभागों द्वारा सेवा आपूर्ति में उत्‍कृष्‍टता के मानदंड (सेवोत्तम) के लिए भी एक मॉडल का विकास किया है। इस परियोजना का मुख्‍य उद्देश्‍य सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे नागरिकों के अनुभवों का प्रयोग कर नागरिक संहिता में इनके प्रतिमान स्थापित करना है। तय मानदंडों पर यह प्रक्रिया कितनी खरी उतर रही है, इसकी जांच की जाती है और इसकी कार्यकुशलता का भी पता लगाया जाता है। इस माडल का उद्देश्य उत्‍कृष्‍टता के प्रभावी कार्यान्‍वयन के माध्‍यम से नागरिकों के दृष्टिकोण से सेवा आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार करना है। इस मॉडल को सभी केन्‍द्रीय मंत्रालयों/विभागों में कार्यान्वित किया जाना है।

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने सेवात्तम माडल का अध्ययन करने के बाद इसे सही दिशा में उठाया गया एक कदम बताया था। इसके साथ ही आयोग ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों द्वारा इस सात चरणीय माडल को अपने उन सभी संस्थाओं में लागू करने की अनिवार्यता सुनिश्चित करने की बात कही जहां कहीं भी आम जनता सीधे संपर्क में आती है। वर्तमान में प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत दस केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में यह माडल चला रखा है। इनमें से डाक विभाग में पायलट प्रोजेक्ट पूरा भी हो चुका है। और मार्च 2008 के लिए गोल डाकखाना, नई दिल्ली को सबसे पहला सेवोत्तम प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। शेष नौ विभागों में पायलट प्रक्रिया विभिन्न चरणों में है।
प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग देश में अच्‍छी शासन प्रथाओं को प्रोत्‍साहन देने के लिए अधिदेशित है। सर्वोत्तम प्रथाओं का प्रलेखन, इनक्‍यूबेशन और प्रसार इसकी संकल्‍पना और अभियान वक्‍तव्‍य में निहित कार्यों में से हैं। इसके पालन और देश में अच्‍छे शासन को प्रोत्‍साहन देने के लिए विभाग ने अनेक दिशाओं वाली कार्य नीतियां अपनाई हैं। प्रकाशन, गो‍ष्ठियों का आयोजन, क्षेत्रीय सम्‍मेलन, प्रस्‍तुतीकरण के आयोजन, व्‍याख्‍यान श्रृंखला आयेजित करना और लघु फिल्‍में का निर्माण जैसे कामों के द्वारा जागरूकता लाने का प्रयास किया जा रहा है।

अपने नियमित प्रकाशनों ''मैनेजमेंट इन गवर्नमेंट एक तिमाही जर्नल'' और ''सिविल सर्विस न्‍यूज़ - एक मासिक समचार पत्रिका'' के माध्‍यम से सर्वोत्तम प्रथाओं के बारे में विभाग जागरूकता लाता है। इसके अलावा इसके द्वारा पांच पुस्‍तकें ''आइडिया दैट हेव वर्क्‍ड'', ''लर्न फ्रॉम दैम'' , '' स्पेल्न्डर इन द ग्रास'', '' रूफलेस टावर'' और ''बीवायओबी- ब्रिंग योर बाइट'' भी प्रकाशित की गई हैं। इन किताबों में कुछ नया करने की सोच रखने वालों की सफलता और असफलता के अनुभव साझा किए गए हैं।

‘गवर्नेंस नालेज सेंटर’ नामक एक पोर्टल, जिसमें की अब तक के उपयोगी व्यावहारिक कदमों की जानकारी दी गई है, का निर्माण किया गया है। ताकि इन कदमों का अनुसरण करके अच्छे परिणाम प्राप्त करने में आसानी हो। विभाग ने 1812 से प्रशासनिक सुधारों पर 73 चुने हुए आयोगों / समितियों की रिपोर्ट के वाली एक डीवीडी भी तैयार की है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्‍ट्रपति द्वारा होती है। उसको पद से हटाने की प्रक्रिया और कारण सर्वोच्‍च न्‍यायालय के संबंध में लागू प्रक्रिया के समान ही है। जब वह अपने पद में नहीं रहता तो वह केंद्र या राज्‍य सरकार के अधीन और कोई पद धारण करने का पात्र नहीं होता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की सलाह से राष्‍ट्रपति केंद्र और राज्‍यों की लेखाओं को रखे जाने के लिए प्रपत्र निर्धारित करता है। केंद्र और राज्‍यों से संबंधित की उसकी लेखा संबंधी रिपोर्टें राष्‍ट्रपति और संबंधित राज्‍यपालों को भेजी जाती है जिन्‍हें संसद और राज्‍य विधायिका के समक्ष रखा जाता है।

राजभाषा

राजभाषा

राजभाषा - संवैधानिक/वैधानिक प्रावधान

संविधान की धारा 343(1) के अनुसार देवनागरी लिपि में हिन्‍दी संघ की राजभाषा होगी। धारा 343(2) में अंग्रेजी को आधिकारिक कार्य में उपयोग संविधान आंरभ होने की तिथि के 15 वर्ष (अर्थात 25 जनवरी 1965) की अवधि तक जारी रखने के लिए कहा गया है। धारा 343(3) में संसद को 25 जनवरी 1965 के बाद भी आधिकारिक प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के उपयोग को जारी करने के‍ लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया है। तदनुसार राजभाषा अधिनियम, 1963 (संशोधित 1967) की धारा 3(2) के अनुसार 25 जनवरी 1965 के बाद भी आधिकारिक कार्य में अंग्रेजी के उपयोग को जारी रखने के बात कही गई है। इस अधिनियम में यह भी बताया गया है कि हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का उपयोग कुछ विशिष्‍ट प्रयोजनों के लिए अनिवार्य रूप से किया जाएगा जैसे कि प्रस्‍ताव, सामान्‍य आदेश, नियम, अधिसूचना, प्रशासनिक तथा अन्‍य रिपोर्ट, प्रेस सम्‍प्रेषण, प्रशासनिक और अन्‍य रिपोर्ट तथा संसद के सदनों या सदन में रखे जाने वाले आधिकारिक पत्र; संविदाएं, करार, लाइसेंस, अनुज्ञा पत्र, निविदा सूचनाएं और निविदा के प्रपत्र आदि।

1976 में राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 8(1) के प्रावधानों के तहत राजभाषा के नियम बनाए गए थे। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्‍नानुसार हैं:
  1. ये आयुक्‍त, समिति या ट्रिब्‍यूनल के किसी कार्यालय सहित सभी केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालयों पर लागू होंगे, जिनकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की गई है और निगम या इसके द्वारा स्‍वामित्‍व वाली अथवा नियंत्रित कंपनियां;
  2. केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालय से राज्‍य / संघ राज्‍य क्षेत्र या ''क'' क्षेत्र में रहने वाले किसी व्‍यक्ति को भेजा गया संप्रेषण हिन्‍दी में होगा, जो हैं उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्‍ड, हिमाचल प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्‍ड, राजस्‍थान, हरियाणा और अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह एवं दिल्‍ली;
  3. केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालय से राज्‍य / संघ राज्‍य क्षेत्र या ''ख'' क्षेत्र में रहने वाले किसी व्‍यक्ति को भेजा गया संप्रेषण हिन्‍दी में होगा, जो हैं पंजाब, गुजरात, महाराष्‍ट्र और चंडीगढ़ संघ राज्‍य क्षेत्र। यद्यपि क्षेत्र ''ख'' में रहने वाले किसी व्‍यक्ति को भेजा गया संप्रेषण अंग्रेजी या हिन्‍दी में हो सकता है।
  4. केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालय से ''ग'' क्षेत्र में राज्‍य सरकार के कार्यालय, जिसमें वे अन्‍य सभी राज्‍य और संघ राज्‍य क्षेत्र शामिल हैं या किसी कार्यालय (जो केन्‍द्रीय सरकार का कार्यालय नहीं है) या व्‍यक्ति को भेजा गया संप्रेषण अंग्रेजी में होगा जिन्‍हें क्षेत्र ''क'' और ''ख'' में नहीं लिया गया है।
  5. केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालयों के बीच और केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालयों से राज्‍य सरकारों / संघ राज्‍य क्षेत्र की सरकारों के कार्यालयों एवं व्‍यक्तियों के बीच सम्‍प्रेषण इस अनुपात में हिन्‍दी में होगा, जैसा समय समय पर निर्धारित किया जाता है।
  6. केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालय से संबंधित सभी हस्‍तपुस्तिकाएं, संहिताएं और अन्‍य प्रक्रियागत साहित्‍य हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों में तैयार किया जाएगा। सभी प्रपत्र, पंजिकाओं के शीर्षक, नाम पट्टिकाएं, सूचना पटल और स्‍टेशनरी आदि के विभिन्‍न मद भी हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों में तैयार किए जाएंगे।
  7. यह अधिनियम की धारा 3(3) में निर्दिष्‍ट दस्‍तावेजों पर हस्‍ताक्षर करने वाले अधिकारी का दायित्‍व होगा कि वह इन्‍हें हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों में जारी करें।
  8. यह प्रत्‍येक केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालय के प्रशासनिक प्रमुख का दायित्‍व होगा कि वह उप नियम 2 के तहत जारी अधिनियम, नियमों और निर्देशों के प्रावधानों का उचित रूप से पालन सुनिश्चित करें तथा इस प्रयोजन के लिए उपयुक्‍त और प्रभावी जांच बिन्‍दु संकल्पित करें।

नीति

राजभाषा संकल्‍प 1968 का पालन करते हुए एक वार्षिक कार्यक्रम राजभाषा विभाग द्वारा तैयार किया जाएगा, जिसमें केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालयों के लिए हिन्‍दी में पत्राचार, टेलीग्राम, टेलेक्‍स आदि भेजने के विषय में लक्ष्‍य तय किए जाएंगे। उपलब्धियों तथा कथित लक्ष्‍यों के बारे में केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालयों से एक तिमाही प्रगति रिपोर्ट मंगाई जाएगी। तिमाही प्रगति रिपोर्टों के आधार पर एक वार्षिक आकलन रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसे संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जाएगा और इसकी प्रतियां राज्‍य सरकारों तथा केन्‍द्रीय सरकार के मंत्रालयों / विभागों को पृष्‍ठांकित की जाएंगी।
बैंगलोर, को‍चीन, मुम्‍बई, कोलकाता, गुवाहाटी, भोपाल, दिल्‍ली और गाजियाबाद में आठ क्षेत्रीय कार्यान्‍वयन कार्यालयों की स्‍थापना संघ की राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन की निगरानी हेतु की गई है।

समि‍तियां

राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4 के तहत 1976 में गठित राजभाषा पर एक संसदीय समिति संघ में राजभाषा के रूप में हिन्‍दी के उपयोग की आवधिक समीक्षा करने के लिए तथा इसकी रिपोर्ट राष्‍ट्रपति को सौंपने के लिए गठित की गई थी। इस समिति में लोक सभा के 20 और राज्‍य सभा के 10 सदस्‍य होते हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट हिस्‍सों में जमा करने का निर्णय लिया है। अब तक इस रिपोर्ट के आठ भाग राष्‍ट्रपति के पास जमा किए जा चुके हैं। इसकी रिपोर्ट के सात भागों पर राष्‍ट्रपति के आदेश जारी किए जा चुके हैं और आठवें भाग पर कार्य प्रगति पर हैं।

वर्ष 1967 में केन्‍द्रीय हिन्‍दी समिति का गठन किया गया था। इसके अध्‍यक्ष प्रधानमंत्री हैं। यह नीति निर्माता शीर्ष निकाय है, जो संघ की राजभाषा के रूप में हिन्‍दी के प्रगामी उपयोग और प्रवर्धन के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत बनाता है।

केन्‍द्रीय हिन्‍दी समिति के निर्देशों के अधीन संबंधित मंत्रियों की अध्‍यक्षता में सभी मंत्रालयों / विभागों में हिन्‍दी सलाहकार समितियां गठित की गई हैं। ये समितियां अपने संबंधित मंत्रालयों / विभागों तथा कार्यालयों और उपक्रमों में हिन्‍दी के उपयोग की प्रगति की समीक्षा आवधिक रूप से करती हैं और हिन्‍दी के उपयोग को बढ़ावा देने के सुझाव देती हैं।

इसके अलावा केन्‍द्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति (राजभाषा विभाग के सचिव की अध्‍यक्षता में और सभी मंत्रालयों / विभागों के राजभाषा के प्रभारी संयुक्‍त सचिवों के साथ पदेन सदस्‍यों के रूप में) द्वारा संघ के आधिकारिक प्रयोजनों के लिए हिन्‍दी के उपयोग की स्थिति की समीक्षा की जाती है, राजभाषा विभाग द्वारा समय समय पर जारी अनुदेशों का कार्यान्‍वयन किया जाता है और हिन्‍दी में इसके कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। तथा इन अनुदेशों के कार्यान्‍वयन में देखी गई कमियों और कठिनाइयों को दूर करने के उपाय सुझाए जाते हैं।

दस या दस से अधिक केन्‍द्रीय सरकार के कार्यालयों वाले शहरों में हिन्‍दी के उपयोग की प्रगति की समीक्षा के लिए उनके सदस्‍य कार्यालयों में शहर राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति गठित की जाती है और अनुभवों को आपस में बांटा जाता है। देश भर में अब तक 255 शहर राजभाषा कार्यान्‍वयन समितियां गठित की गई हैं।

पुरस्‍कार योजना

वर्ष 1986-87 से इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्‍कार योजना प्रचालनरत है। प्रत्‍येक वर्ष मंत्रालयों / विभागें, बैंकों और वित्तीय संस्‍थानों, सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्‍ठानों तथा शहर राजभाषा कार्यान्‍वयन समितियों को संघ की राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन में असाधारण उपलब्धियों के लिए पदक दिए जाते हैं। केन्‍द्रीय सरकार, बैंकों, वित्तीय संस्‍थानों, विश्‍वविद्यालयों, प्रशिक्षण संस्‍थानों और केन्‍द्रीय सरकार के स्‍वायत्त निकायों को हिन्‍दी में मूल पुस्‍तकें लिखने वाले कार्यरत / सेवा निवृत्त कर्मचारियों को नकद पुरस्‍कार दिए जाते हैं।

ज्ञान विज्ञान पर मूल पुस्‍तक लेखन के लिए एक राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार योजना को आधुनिक विज्ञान/ प्रौद्योगिकी तथा समकालीन विषयों की सभी शाखाओं में हिन्‍दी भाषा में पुस्‍तकें लिखने को प्रोत्‍साहन देने के लिए इसे राजीव गांधी राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार योजना का नाम दिया गया है। यह योजना भारत के सभी नागरिकों के लिए खुली है।

क्षेत्रीय स्‍तर पर क्षेत्रीय राजभाषा पुरस्‍कार प्रति वर्ष संघ की राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन और हिन्‍दी के प्रगामी उपयोग को आगे बढ़ाने में असाधारण उपलब्धियों के लिए क्षेत्रीय / अधीनस्‍थ कार्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों, शहर राजभाषा कार्यान्‍वयन समितियों, बैंकों और केन्‍द्रीय सरकार के वित्तीय संस्‍थानों को पुरस्‍कार दिए जाते हैं।

प्रशिक्षण

राजभाषा विभाग द्वार प्रशासित हिन्‍दी शिक्षण योजना के तहत 119 पूर्ण कालिक और 49 अशंकालिक केन्‍द्रों के माध्‍यम से हिन्‍दी भाषा में प्रशिक्षण दिया जाता रहा है, जो देश भर में फैले हुए हैं। इसी प्रकार 23 पूर्णकालिक और 38 अंशकालिक केन्‍द्रों के माध्‍यम से हिन्‍दी आशुलेखन और हिन्‍दी टंकण में प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। हिन्‍दी में प्रशिक्षण देश के विभिन्‍न भागों में स्थित 229 केन्‍द्रों में प्रदान किया जा रहा है। कोलकाता, मुम्‍बई, दिल्‍ली, चेन्‍नई और गुवाहाटी के हिन्‍दी शिक्षण योजना के पांच क्षेत्रीय कार्यालय पूर्ण, पश्चिम, उत्तर - मध्‍य, दक्षिण और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में हिन्‍दी शिक्षण योजना को शैक्षिक तथा प्रशासनिक सहायता प्रदान करते हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र के हिन्‍दी प्रशिक्षण की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए एक नए क्षेत्रीय मुख्‍यालय की स्‍थापना गुवाहाटी में की गई है और इम्‍फाल, एज़वाल तथा अगरतला में नए हिन्‍दी प्रशिक्षण केन्‍द्र खोले गए हैं।

केन्‍द्रीय हिन्‍दी प्रशिक्षण संस्‍थान की स्‍थापना 31 अगस्‍त, 1985 को राजभाषा विभाग के एक अधीनस्‍थ कार्यालय के रूप में हिन्‍दी भाषा / टंकण तथा आशुलेखन में संघनित पाठ्यक्रमों के माध्‍यम से हिन्‍दी प्रशिक्षण प्रदान करने के साथ ही हिन्‍दी भाषा और हिन्‍दी टंकण में पत्राचार पाठ्यक्रमों के माध्‍यम से भी प्रशिक्षण देने उद्देश्‍य के साथ की गई थी। मुम्‍बई, कोलकाता और बैंगलोर में 1988 के दौरान तथा चेन्‍नई और हैदराबाद में 1990 के दौरान इसके उप संस्‍थान खोले गए। हिन्‍दी टंकण का प्रशिक्षण कम्‍प्‍यूटर पर देने की व्‍यवस्‍था देश के लगभग सभी टंकण/ आशुलेखन केन्‍द्रों में की जा रही है।
केन्‍द्रीय अनुवाद ब्‍यूरो की स्‍थापना मार्च 1971 में विभिन्‍न मंत्रालयों / विभागों, केन्‍द्र सरकार के कार्यालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों आदि के विभिन्‍न गैर वैधानिक साहित्‍य, हस्‍तपुस्तिकाओं / संहिताओं, प्रपत्रों आदि के विभिन्‍न प्रकारों के अनुवाद हेतु की गई थी। इस ब्‍यूरो को अनुवाद कार्य के साथ जुड़े अधिकारियों / कर्मचारियों के लिए अनुवाद प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को आयोजित करने के दायित्‍व सौंपे गए हैं। आरंभ में नई दिल्‍ली स्थित मुख्‍यालय में 3 माह का अनुवाद प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित किया जाता था, प्रशिक्षण सुविधाओं को सुदृढ़ बनाने और क्षेत्रीय आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए मुम्‍बई, बैंगलोर और कोलकाता में अनुवाद प्रशिक्षण केन्‍द्रों की स्‍थापना की गई है। इसके अलावा केन्‍द्रीय अनुवाद ब्‍यूरो द्वारा केन्‍द्रीय सरकार के कर्मचारियों के लिए अल्‍पावधि अनुवाद पाठ्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

तकनीकी

यांत्रिक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, विशेष रूप से कम्‍प्‍यूटर की सहायता से राजभाषा के उपयोग की सुविधा प्रदान करने के लिए अक्‍तूबर 1983 में राजभाषा विभाग के तहत एक तकनीकी प्रकोष्‍ठ स्‍थापित किया गया था। इस प्रकोष्‍ठ की मुख्‍य गतिविधियां इस प्रकार हैं:
  • ''भाषा अनुप्रयोग साधन'' का विकास - इस कार्यक्रम के तहत लीला राजभाषा, बंगला, अंग्रेजी, कन्‍नड़, मलयालम, तमिल और तेलुगु के माध्‍यम से स्‍व्‍यं सीखने के पैकेज का विकास किया गया है, मंत्रा राजभाषा अंग्रेजी से हिन्‍दी अनुवाद का एक सहायक साधन है, जिसका विकास किया गया है।
  • हिन्‍दी में कम्‍प्‍यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन - प्रतिवर्ष कम्‍प्‍यूटर पर हिन्‍दी के उपयोग के लिए प्रशिक्षण देने हेतु लगभग 100 प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
  • द्विभाषी अभिकलन पर प्रदर्शनियां और गोष्ठियां आयोजित करना - प्रयोक्‍ताओं तथा निर्माताओं को सहायता देने के लिए तकनीकी गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं जहां हिन्‍दी के सॉफ्टवेयर के उपयोग पर आमने सामने चर्चा की जाती है।
राजभाषा विभाग ने अब अपने पोर्टल का गठन किया है। www.rajbhasha.gov.in(बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं).

प्रकाशन

राजभाषा विभाग द्वारा एक तिमाही पत्रिका ''राजभाषा भारती'' का प्रकाशन किया जाता है जो हिन्‍दी में राजभाषा, साहित्‍य, प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में लेखन को प्रोत्‍साहन देने एवं केन्‍द्रीय सरकार के विभिन्‍न कार्यालयों में राजभाषा हिन्‍दी के उपयोग और प्रवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों को व्‍यापक प्रचार प्रदान करने हेतु समर्पित है। अब तक राजभाषा भारती के 112 अंक प्रकाशित किए गए हैं। इसी प्रकार राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन का एक वार्षिक कार्यक्रम हर वर्ष तैयार किया जाता है। विभिन्‍न मंत्रालयों / विभागों तथा केन्‍द्रीय सरकार / सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों आदि के कार्यालयों में राजभाषा के उपयोग के विषय में वार्षिक आकलन रिपोर्ट प्रतिवर्ष प्रकाशित की जाती है और इसे संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जाता है। राजभाषा के मेनुअल, केलेण्‍डर, फिल्‍में, पोस्‍टर आदि निकाले जाते हैं जिन से राजभाषा के रूप में हिन्‍दी के प्रगामी उपयोग और प्रवर्धन से संबंधित गतिविधियों के विषय में जानकारी दी जा सके।